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Supreme Court affirms the Right to Privacy as a fundamental right

We welcome the judgment of the Supreme Court affirming the Right to Privacy as a fundamental right. This is a historic day.

This judgment comes to us after a reference in the Aadhaar cases starting in in 2012 where the Union Government in August 2015 argued that the fundamental right to privacy does not exist under the Constitution. Since then the government and UIDAI, the agency managing the Aadhaar database, have consistently argued in Court that Indians have no fundamental privacy and that privacy is a concern only of the elite. These pernicious arguments have finally been laid to rest. 

The unanimous judgment unequivocally recognises the fundamental right to privacy. Today, the majority judgment states what should never have been in doubt that the people of this country have the fundamental right to privacy, whether rich or poor. There can be no waiver of fundamental rights under any circumstances. 

The judgment recognises the efforts of the government to formulate a data protection law. Any law, including a data protection law, that might be formulated will have to make sure that it protects the people's right to privacy. Any policy can be tested on whether it breaches the right to privacy. 

The Union Government had attempted to subvert the Aadhaar matters by referring it to a 9 judge bench of the Supreme Court. Now that the Supreme Court has taken a decision in favour of the petitioners, this means that the field is clear for the Aadhaar now to finally resume hearing by a smaller bench. 

We welcome an early hearing of the Aadhaar petitions. 

The State has been put on notice that it must protect our right to privacy. 


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Chronology of the case

September 2013: SC tells UPA government that Aadhaar cannot be made mandatory for any services.

July-August 2015: NDA Government tells SC that it plans to make Aadhaar mandatory for a range of services. Attorney General M Rohatgi argues citizens have no fundamental right to privacy, shocking everyone. SC says a constitution bench will decide on this.

August 2015: SC limits use of Aadhaar to the Public Distribution System, only on voluntary basis

October 2015: SC allows Aadhaar to be used in four more schemes, purely on voluntary basis

March 2016: NDA Government passes Aadhaar Act as a money bill bypassing Rajya Sabha where it lacks majority. Pushes Aadhaar in over 50 schemes, making it mandatory.

June 2017: SC forms constitution bench to decide right to privacy, after a wait of nearly two years

Read our earlier post on this historic judgement.

Supreme Court image credit Legaleagle86 [CC BY-SA 3.0], via Wikimedia Commons


सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट रूप से निजता को एक मौलिक अधिकार मानता है

आधार के मामले में केंद्र सरकार ने अगस्त 2015 में कहाँ था कि भारत के संविधान के अनुसार निजता एक मौलिक अधिकार नहीं है. तबसे सरकार व Unique Identification Authority of India (UIDAI) जो एगेंसी आधार के डेटाबेस के प्रबंधन के लिए ज़िम्मेदार है, दोनों ने न्यायालय में यह बार बार कहा है कि भारतीयों का निजता का कोई मौलिक अधिकार नहीं है और निजता केवल अभिजात वर्ग की चिंता है. इन हानिकारक तर्कों का आज समापन हो गया है.

संविधानिक पीठ का आज का एकमत फैसला स्पष्ट रूप से निजता को एक मौलिक अधिकार मानता है. इस बहुमत फैसले ने जो कहाँ है वह संदेह का मुद्दा होना ही नहीं चाहिए था: कि निजता इस देश के लोगों का एक मौलिक अधिकार है, चाहे वे अमीर हो या गरीब. किसी भी स्थिति में मौलिक अधिकारों का हनन नहीं हो सकता.

यह फैसला सरकार की डेटा की रक्षा करने के लिए कानून बनाने के प्रयासों को मानता है. भविष्य में बने किसी भी कानून को, डेटा की रक्षा करने के लिए बनाए गए कानून को भी, यह सुनिश्चित करना होगा कि वह लोगों के निजता के अधिकार को बचाए रखे. किसी भी नीती को इस बात पर परखा जा सकता है कि वह निजता के अधिकार का हनन करती है या नहीं.

सरकार ने निजता के अधिकार का मामला सर्वोच्च न्यायालय की एक नौ जजों की पीठ के हवाले कर दिया था. चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाया है, अब आधार के मामले की सुनवाई एक छोटी पीठ के द्वारा पुनः शुरू हो सकती है.

हम आधार की याचिकाओं की जल्द सुनवाई का स्वागत करते हैं.

सरकार को यह सूचित कर दिया है कि वह हमारे निजता के अधिकार की रक्षा करे.

मामले का कालक्रम

सितम्बर 2013: सर्वोच्च न्यायालय UPA सरकार को कहती है कि आधार कोई भी सेवा के लिए अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता.

जुलाई 2015: NDA सरकार सर्वोच्च न्यायालय को कहती है कि उसका आधार को कई सेवाओं के लिए अनिवार्य बनाने का इरादा है. अटर्नी जेनरल मुकुल रोहतगी यह बोलकर कि नागरिकों को निजता का कोई मौलिक अधिकार नहीं है सबको चौका देते हैं. सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि इस बात का निर्णय संविधानिक पीठ करेगी.

अगस्त 2015: सर्वोच्च न्यायालय आधार का प्रयोग जन वितरण प्रणाली तक सीमित करता है, वह भी स्वैच्छिक रूप से.

अक्टूबर 2015: सर्वोच्च न्यायालय चार अन्य योजनाओं में आधार के प्रयोग की अनुमति देता है, पर केवल स्वैच्छिक रूप से.

मार्च 2016: सरकार आधार कानून को एक मनी बिल के रूप में पारित करती है, जिससे राज्य सभा से मंजूरी नहीं लेनी पड़े, जहां उसका बहुमत नहीं है. आधार को 50 से अधिक योजनाओं के लिए अनिवार्य बनाती है.

जून 2017: लगभग दो वर्षों के इंतज़ार के बाद सर्वोच्च न्यायालय निजता के अधिकार पर निर्णय लेने के लिए संविधानिक पीठ का गठन करती है.

आज के फैसले की पृठभूमि के लिए: https://rethinkaadhaar.in/blog/2017/8/24/explainer-what-is-the-right-to-privacy-judgement-all-about

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें [email protected] को लिखें. 


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